भारत की गुलामी की शुरुआत कहाँ से हुई?

Amazing facts of India’s slavery in Hindi

भारत की गुलामी की शुरुआत कहाँ से हुई?

Amazing facts of india’s slavery in hindi प्राचीन भारत का सभ्यता भाषा विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान है। संस्कृत भाषा को सभी भाषाओं की जननी माना जाता है । भारत में ही पूरी दुनिया को पढ़ना लिखना सिखाया न जाने कितने गणित प्राचीन भारत में हुए। जिस समय भारत में वेद लिखे जा रहे थे। आयुर्वेद, योग और चिकित्सा आदि का विकास हो चुका था।  उस समय तक यूरोप और अमेरिका में आदिवासी घूमते रहिते थे। भारत में सबसे पहले व्यापार की शुरुआत हुई।

सम्राट अशोक के समय में भारत का विस्तार अफगानिस्तान तक पहुंच गया था।  लेकिन ऐसे क्या कारण थे कि अनेको अस्त्र और शस्त्र के आविष्कार करने वाला हमारे भारत को हजारों वर्षों तक गुलामी का सामना करना पड़ा। आखिर क्यों और कैसे विदेशी आक्रमणकारियों के आगे भारत के शूरवीर राजावोंको हर का सामना करना पड़ा। शुरवाती के कुछ ऐसे कारण हो सकते है।  जिसके चलते पूरी दुनिया का विश्व गुरु कहे जाने वाले भारत का मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास और गुलामी में गुजरा। 

बौद्ध और जैन धर्म की अहिंसा की शिक्षा

बौद्ध और जैन धर्म की मूल शिक्षा हिंसा है। जैन धर्म में तो अहिंसा परमो धर्म माना गया है। सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्होंने युद्ध करना बिल्कुल ही छोड़ दिया और अहिंसा का प्रचार प्रसार करने लगे। यहां तक कि उन्होंने शिकार करने पर भी रोक लगा दी थी। युद्ध न करने कारण सैनिक कमजोर पड़ते गए और वह अपनी युद्ध कला  भूल गये। इसी प्रकार से अहिंसा का प्रजा के बीच अधिक प्रचार करने से प्रजा भी अहिंसक हो गई। जो कि आसानी से किसी भी आक्रमणकारी का शिकार बन सकती थी।

असल में अहिंसा भी एक बेहद कारगर हथियार है लेकिन यह हर हालात पर लागू नहीं हो सकता। अगर कोई आपके घर के बाहर थूंके  और आप रोजाना मुस्कुराते हुए उस बंदे थूक साफ करें तो हो सकता है कि एक दिन उसे अपनी गलती का एहसास हो जाए और उतना बंद कर दे। लेकिन एक गाल पर थप्पड़ खाने के बाद दूसरा गाल आगे करना अपने बचाव में बेहद गलत तरीका है।

मोहम्मद बिन कासिम ने सिर्फ 3000 सैनिक लेकर अफगानिस्तान और सिंध प्रान्त पर आक्रमण किया तो उसने आसानी से जीत हासिल कर ली क्योंकि वहां अधिक संख्या अहिंसा को माननेवाला बौद्ध धर्म के लोगों की थी जिनके लिए अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म था। उन्होंने बिना लड़ाई किए ही अपनी हार मान ली जबकि मोहम्मद बिन कासिम की छोटी-सी सेना को आसानी से हराया जा सकता था। उसके बाद घोरी और गजनबी आए और उन्होंने अफगानिस्तान से अहिंसावादी बौद्ध का नाम और निशान मिटा दिया।  किसी तरह से जैन धर्म भी अति अहिंसा वादी होने के कारण विदेशी आक्रमणकारियों का मुकाबला नहीं कर सका।  और क्योंकि यह दोनों ही धर्म सनातन धर्म की शाखाएं मानी जाती है तो निश्चित तौर पर इन की शिक्षाओं का प्रभाव हिंदुओं पर भी पड़ा और वह भी हिंसक हो गए जिस कारण से मुगलों का सामना नहीं कर पाए। 

सामाजिक भेदभाव।

हमारे देश में लोगों का हुजूम है लेकिन यह हुजूम कभी समाज नहीं बन सका।आज ही की तरह मध्यकालीन और प्राचीन भारत में भी 85% जनसंख्या वैश्य और शूद्रों की होती थी।  किंतु शिक्षा पर अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों का होता था और युद्ध करना सिर्फ क्षत्रियों का ही फर्ज होता था। जबकि क्षत्रियों की संख्या लगभग 5% ही थी। यानी जब बाहर से आक्रमणकारी हमारे देश पर हमला करते थे तो सिर्फ 5% लोग ही उनका सामना करते थे और बाकी के 95% लोग दूर बैठकर तमाशा देखते थे। अगर कोई नीची जाति का माने जाने वाला व्यक्ति सेना में शामिल होना भी चाहता था तो उसे लज्जित करके भगा दिया जाता था। भले ही वह कितना ही काबिल क्यों ना हो।

मंगोल, तुर्क और अफगानी लुटेरों के समाज में ऐसे विभाजन नहीं थी। वहां कोई भी आदमी योग्य होने पर सैनिक बनकर अपने देश की हिफाजत कर सकता था। वहां एक खुली प्रतियोगिता थी इस लिए युद्ध कौशल का बहुत तेजी से विकास हुआ। भारत में असमानता  इतनी ज्यादा थी की क्षत्रियो में भी आपस फहुत थी।वह अपसमेही  में ही लड़ते रहते थे इसी वजह से विदेशी आक्रमणकारियों ने एक-एक करके सभी राजा ओको हराना सगर कर दिया। क्यूंकि ओ सब मिलकर एक साथ उनका सामना नहीं करते थे। अंग्रेजों ने भी इसी भेदभाव का खूब फायदा उठाया और हिंदू और मुस्लिम के बीच मे फुट डालो और अपना राज कायम जेम किया। और ये आज भी बरकरार है और जिसका फायदा नेता खूब उठा रहे है।  

राजपूतों के बड़े-बड़े उसूल

थाईलैंड के पास एक छोटा सा देश है “वियतनाम” जिसने अमेरिका जैसी महाशक्ति को लगातार 20 सालों तक चले युद्ध में हरा दिया था। एक समय में विदेश मंत्री भारत आए हुए थे पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार गांधी जी की समाधि दी गई तो वे बोले कि मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप की समाधि कहां है। मुझे महाराणा प्रताप की समाधि देखनी है। जब उनको राणा प्रताप की समाधि दिखाई गई तो उन्होंने बताया कि हम आज भी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। हम ने अमेरिका को महाराणा की युद्ध नीति और उनके जीवन से मिली प्रेरणा से ही हराया था।  निश्चित तौर राजपूत शूरवीर थे । लेकिन उनमें एकता की कमी थी उन्होंने कभी  संगठित होकर का सामना नहीं किया।

एक और गलती जो राजपूत करते थे वही है कि उन्हें अपने उसूल अपनी जान से भी ज्यादा प्यारे थे। जब मोहम्मद गोरी ने आक्रमण किया तो पृथ्वीराज ने उसे पकड़कर यह कह कर छोड़ दिया कि राजपूत कभी निहत्थे पर वार नहीं करते। लेकिन वही मौका जब मोहम्मद घोरी को मिला तो उसने बहुत बुरी यातना देकर पृथ्वीराज को मौत के घाट उतार दिया। चित्तौड़ के राजा रावल रतन सिंह ने भी अलाउद्दीन खिलजी को कई बार पकड़ कर छोड़ दिया। लेकिन खिलजी ने अवसर पाते ही धोखे से रतन सिंह को बंदी बना लिया।  ठीक इसी तरह से बाबर ने भी राणा सांगा के राजपूतों उसूलो का फायदा उठाकर ही उने युद्ध में हराया।

मुगल आक्रमणकारियों का उसूल था की युद्ध में सिर्फ जीत चाहिए फिर चाहे वह जीत कैसे भी मिली राजपूतों ने कभी अपने राज्यों की सीमा बढ़ाने भी नहीं चाहिए। अपने राज्यों में ही संतुष्ट रहते थे इसके विपरीत मुगलों ने ने अपनी सीमाओं का विस्तार करने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। इसी वजह से बेहतरीन युद्ध कला सीख पाये। मुगल कितने खूंखार थे ये इस बात से पता चलता है कि वह भूख लगने पर वे अपने ही घोड़ को मारकर खा जाते थे। उनके अंदर बेहद खूंखार प्रवृत्ति पनप चुके थीं। जिससे वह एकजुट होकर अचानक से पूरी शक्ति लगाकर हमला करते थे।

हमारे राजाओं ने कभी युद्ध नीति में परिवर्तन करने की कोशिश नहीं की जब बाहरी ताकतें युद्ध के दौरान तोपों का इस्तेमाल करने लगी थी तो भी राजपूत अपनी तलवार पर ही भरोसा दिखाते रहे। मुगलों के साथ कई युद्धों में राजपूतों की सैन्य शक्ति मुगलों से ज्यादा थी लेकिन आपसी मनमुटाव के चलते वे  किसी एक की नहीं सुनते थे और निश्चित ही बड़ी सेना का तब तक कोई फायदा नहीं है जब तक वह संगठित होकर ना रहे। वहीं दूसरी और मुगलों की सेना उसूलों पर नहीं बल्कि अनुशासन पर युद्ध लड़ती थी। अगर कोई सैनिक किसी भी आदेश का उल्लंघन करता तो दुश्मन से पहले उस सैनिक को सजा दी जाती थी और मुगलों की यही खूंखार नीति राजपूतों के उसूलों पर हमेशा भारी पड़ी रही। और भारत की गुलामी का कारण बनी।

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